subodh

subodh

Wednesday, 4 February 2015

36 . पैसा बोलता है ...


एक साधारण सा सर्वमान्य सा जवाब चुना गया है ,जिस से हम में से किसी  को भी ज्यादा न सोचना पड़े क्योंकि अगर हम ने सोचना शुरू कर दिया तो संभव है हम जो जवाब दे वो  सुविधापूर्ण खोल से अलग हो - यही आज की शिक्षा नीति कर रही है - बच्चे जिनमे सोचने की क्षमता है उस क्षमता को क़त्ल कर दिया जाता है और उन्हें सिर्फ एक जवाब रटाया जाता है बाकी सारे जवाब विद्यार्थी को जीरो दिलाने वाले होते है लिहाजा कई दूसरे जवाब से वाकिफ होने के बावजूद भी विद्यार्थी जीरो के डर से उन्हें नहीं देता और सालों-साल इसी माहौल से गुजरता विद्यार्थी अंततः अपनी सोचने की क्षमता खो देता है और यही वो उपलब्धि है जो शिक्षा नीति शिक्षा के नाम पर बच्चों को उपलब्ध करवा रही है .( शिक्षा नीति आपको सिर्फ एक सही जवाब पर केंद्रित करती है बाकि के सारे जवाब आपको जीरो दिलाते है  ).
 बड़े होने के बाद कल के बच्चे जो आज वयस्क होकर ऑफिस में काम कर रहे है इसी संस्कृति से दुबारा वाकिफ होते है जब बॉस को ,सीनियर्स को किसी समस्या पर  उनके मन मुताबिक एक ही जवाब चाहिए होता है यानि उन व्यस्कों की क्रिएटिविटी कुचल दी जाती है , ये बॉस , ये सीनियर्स उसी शिक्षा नीति से निकले हुए पुर्जे है ,एक निश्चित सांचे में ढाले हुए पुर्जे जिनका सोचने का, समझने का और करने का एक निश्चित तरीका है . 
जब जड़ ही सड़ी-गली है, स्वस्थ्य नहीं है तो फल अच्छे कहाँ से आएंगे ?
अच्छे फल पाने के लिए  क्या आपको नहीं लगता कि शिक्षा नीति में एक बड़े बदलाव की दरकार है ? जहाँ बच्चों को रटना नहीं सोचना सिखाया जाए और सवाल का हल एक नहीं कई हो - बिलकुल  ज़िन्दगी  की  तरह . फिर निश्चित ही कपूर साहब के लड़के को जीरो नहीं दिया जायेगा और शायद किसी की भी ज़िन्दगी में जीरो नहीं होगा , क्योंकि ज़िन्दगी में हारने का डर कभी भी उस जवाब से नहीं होता जिसे आप जानते है बल्कि उस जवाब से होता है जिसे आप नहीं जानते . 
( कृपया इस बारे में पोस्ट 35 . पैसा बोलता है ... भी देखें )
 सुबोध- ४ फरबरी, २०१४ 

1 comment: